Friday, August 1, 2014

जिन्ह हाथो से दुआ मांगते, उन्ही हाथो से कतल न होता |

मजहब की आड़ में होते है सौदे,
घर इनका भी तबाह होता है,
घर उनका भी तबाह होता है |
न जाने कोनसे खुदा को खुश करने की चाहत में,
न जाने कितनो के गले रेत देता है |
अगर कहीं खुद को ही खोजा होता,
जिन्ह हाथो से दुआ मांगते, उन्ही हाथो से कतल न होता |
मेरी नजर में वो नूर-इ-इलाही कोई और नही,
अगर मोहब्बत से रहे तो ...तू ही खुदा,
नहीं तो शैतान ही हर मैं में बस्ता है,
जो न मजहब देखता है, न इंसान देखता है,
फिर एक लिबास की आड़ में, न जाने कितना गुनाह करता है |
छोड़ नफरत की आग, अपने दिल के अंदर झाँक
हर ज़र्रे में नजर वो तुम्हे खुदा आएगा,
हर शह में फिर ईश्वर का रूप झलक जाएगा |||
Extremely Sorry If Someone's sentiments Hurts....!!!