Saturday, April 23, 2011

आंसू ही आंसू.....

पानी का बुलबुला तूं है प्राणी, पानी का बुलबुला तूं |
क्या तूं है करता, किसके लिए करता, कुछ नही जानता तूं |
किसी को तूं नही समझे, कोई तुझे नहीं समझे |
जिस चीज़ की हो आस तेरे दिल मैं, बस वही न तुझे मिले |
सच समझ नही आता, सच पीया भी नही जाता |
प्यार अगर बरसाता भी है प्रभु, वो भी छू के निकल जाता है |
इतना कर रखा है गन्दा इस देह को, कोई भी इसके पास नही आता है |
हम समझते है, हम जो करते है वो ठीक है,
वो(प्रभु) भी दुश्मन के रूप में दर्शन दे जाता है |
हमारी हालत भी उस हिरन के जैसे हो जाती है, कस्तूरी की महक तो खुद से आती है |
वो भी दर दर भटकता रहता है, हासिल कुछ नही होता और अपनी जान गवा देता है |
हम पूरी धरती में कही भी चले जाते है, लेकिन अपनी परछाई से नही बच पाते है |
चैन दिल का कैसे पाया जाये, इस दुनिया में लायक नही तेरे कोई, फिर भी कैसे जिया जाये,
यह भी मालूम है, रास्ता अकेले तह करना है, फिर भी न जाने क्यों साथ ढूंढते है |
लेकिन एक पल के लिए अकेले रहि नही सकते, झूठे हस्ते रहते है दूसरों के सामने |
बस जब अकेले होते है, आंसू ही आंसू चलते है....|

1 comment:

kushal said...

Very nice and meaningful Bro...