Sunday, October 31, 2010

मैं घर आना ......

मैं रात रात भर ये सोचता हुं, हर ख्वाब में ऐसा देखता हुं !
ये शब् भी अच्छी लगती नही, ये सुबह भी अब चहकती नही !
तेरे आँगन में बीता बचपन वो, तेरे आँगन में बीताया हर पल,
बस मुझे सदा रुलाता है , हर पल तुम्हारी याद दिलाता है !
क्यूँ तुम से मुझे दूर जाना पढ़ा, बस यही गम सताता है !
भाई छोटे को भी नहीं भुल पाता,  इसीलिए उसको हर रोज हुं फ़ोन लगाता !
तोड़ के मोह माया का, माँ अब मैं घर आना चाहता हूँ |

3 comments:

Udan Tashtari said...

सभी के मन की यही चाहत है...

बहुत अच्छा.

ANU VISHNOI said...

gud one

Raman said...

thanks friends