Sunday, March 28, 2010

दे दो रौशनी......

रात ने ओढ़ी चादर, छाया चारो ओर अँधेरा !
काली चादर रात की, डर गया कितना इन्सान !
चाँद ने की चांदनी, छटा अँधेरा, हुआ परकाश !
सोया रहा फिर भी इन्सान, बन कर यु अनजान !
न देखे वह खुद को, न देखे वह समय बलवान !
अंधियारे से भागे, डर कर तेज तरार !
ले रौशनी दीये की, वह कुछ समझा-संभला !
मीलों आगे क्या है, कहा खो गया वो रस्ता !
हे प्रभु ..... अब कर दो उजियारा, जागे ये संसार !
हो एक जुट .... मिलकर रहे, यही है मेरी पुकार !
मदद करे दुसरो की, करे पहल....... समझ खुद को मददगार !
मौका दिया प्रभु ने ...... स्वयं मिलन का, करे न कोई गंवार !
दे दो रौशनी ऐसी, भुला के नफरत, देखे केवल मोहबत प्यार !

अंधियारे

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